अगर मैं तुमसे पूछूँ तुम अपने मन के मालिक हो? शायद तुम तुरंत कहोगे हाँ। लेकिन अगर तुम्हारा मन सच में तुम्हारे नियंत्रण में है तो फिर एक ग़लत विचार को रोक क्यों नहीं पाते? एक अश्लील तस्वीर देखकर बार-बार उसी ओर क्यों खिंच जाते हो? एक बार छोड़ने का फैसला करने के बाद भी फिर उसी जगह क्यों लौट आते हो? क्या सच में तुम मन को चला रहे हो? या मन तुम्हें चला रहा है?
आज का युवा कहता है…”बस थोड़ा-सा Entertainment है।” लेकिन जिस चीज़ को तुम मनोरंजन कह रहे हो उसी ने तुम्हारी इच्छाओं का मालिक बनना शुरू कर दिया है। तुम्हें लगता है तुम सिर्फ़ कुछ मिनट देख रहे हो। सच यह है वह कुछ मिनट धीरे-धीरे तुम्हारी पूरी सोच बदल रहे हैं।
ज़रा अपने दिन को देखो, सुबह उठते ही मोबाइल, Instagram ,Reels, छोटे-छोटे वीडियो शरीर का प्रदर्शन, उत्तेजना और फिर तुम कहते हो…”मन बहुत भटकता है।” मन भटकेगा नहीं तो क्या करेगा? तुमने उसे शांति कब दिखाई?
सबसे बड़ा भ्रम क्या है? वासना शरीर में होती है। बिल्कुल नहीं। वासना पहले मन में पैदा होती है। शरीर सिर्फ़ उसका अनुसरण करता है। सोचो अगर किसी इंसान को पूरे दिन मिठाइयों के बीच बैठा दो तो क्या उसे बार-बार खाने का मन नहीं करेगा? फिर अगर तुम अपने मन को हर दिन उत्तेजना से भरोगे तो उससे पवित्र विचारों की उम्मीद कैसे कर सकते हो?
आज लोग कहते हैं दुनिया बदल गई है। नहीं दुनिया नहीं बदली। तुम्हारी आँखों के सामने वासना को सामान्य बना दिया गया है। और जिस चीज़ को बार-बार सामान्य बताया जाए मन उसे सही मानने लगता है।
भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते है कि विषयों का चिंतन करने से आसक्ति पैदा होती है और आसक्ति से कामना जन्म लेती है यही पूरी कहानी है वासना अचानक नहीं आती। वह बार-बार देखने से, बार-बार सोचने से और बार-बार कल्पना करने से पैदा होती है। स्वयं से पूछिए तुम एक महीने तक तुम अपने मन को उत्तेजित करने वाली हर चीज़ से दूर रखो तो क्या होगा? शायद पहले बेचैनी होगी। क्योंकि जिस चीज़ की आदत पड़ जाती है उसे छोड़ना आसान नहीं होता। लेकिन धीरे-धीरे मन हल्का होने लगेगा।
आज का युवा कहता हैं कि इच्छा अपने आप आ जाती है। नहीं। इच्छा तुम्हारे रोज़ के चुनावों से बनती है। तुम क्या देखते हो, क्या सुनते हो, किन लोगों के साथ रहते हो, कैसा Content Consume करते हो इसी से तुम्हारा मन बनता है। तुम कहते हो मैं लड़की देखता हूँ इसलिए मन भटकता है। सच? अगर ऐसा होता तो हर आदमी एक जैसा होता। समस्या लड़की नहीं है। असली समस्या तुम्हारी दृष्टि है। जिस आँख में केवल शरीर दिखाई देता है वहाँ मनुष्य दिखाई ही नहीं देता।
आध्यात्मिकता वासना को दबाना नहीं सिखाती। वह वासना को समझना सिखाती है। क्योंकि जिसे तुम समझ लेते हो उसके गुलाम नहीं रहते। जब जीवन में कोई बड़ा उद्देश्य नहीं होता तो छोटी-छोटी इच्छाएँ पूरे जीवन पर कब्ज़ा कर लेती हैं।और खाली मन अक्सर वासना का घर बन जाता है। यही कारण है जो युवा सीखने में, सृजन करने में, सेवा में या किसी बड़े लक्ष्य में लगे होते हैं वे भी इच्छाओं से मुक्त नहीं होते लेकिन उन इच्छाओं के गुलाम नहीं बनते।
याद रखो वासना की समस्या शरीर की नहीं है। दिशाहीन जीवन की है। जब जीवन में सत्य की खोज नहीं होती तो मन क्षणिक सुखों की तलाश करने लगता है।
निष्कर्ष-
तुम वासना के कंट्रोल में इसलिए नहीं आते क्योंकि तुम कमजोर हो। तुम इसलिए फँसते हो क्योंकि तुमने अपने मन को बिना पहरेदार के छोड़ दिया है। और जिस घर का दरवाज़ा खुला हो वहाँ कोई भी आ सकता है। आज सवाल यह नहीं है कि तुम वासना से कितनी बार हार चुके हो सवाल यह है क्या तुमने कभी यह समझने की कोशिश की, कि वह तुम्हारे भीतर आती कहाँ से है? जिस दिन तुमने इस सवाल का उत्तर खोज लिया उसी दिन तुम लड़ाई जीतने की दिशा में पहला कदम रख चुके हो। क्योंकि वासना से मुक्ति लड़ने से नहीं जागने से मिलती है।
