हमारे समाज में एक अजीब परंपरा है। त्यौहार आए तो हम कहते है कि नारी शक्ति है।, नारी देवी है। उसके चरण छूते हैं पूजा करते हैं और फूल चढ़ाते हैं। लेकिन जैसे ही वही स्त्री अपने जीवन का कोई निर्णय लेना चाहती है अचानक वह देवी नहीं रहती।
वह कहे मुझे अभी शादी नहीं करनीतो सवाल।, वह कहे मुझे अपना करियर चुनना है तो सवाल | वह कहे मैं इस रिश्ते में खुश नहीं हूँ। तो फिर सवाल। अजीब बात है कि पूजा करने में कोई समस्या नहीं हैं लेकिन उसकी इच्छा सुनने में समस्या है। शायद हमने स्त्री को इंसान से पहले एक भूमिका बना दिया। किसी के लिए वह बेटी है, किसी के लिए पत्नी और किसी के लिए माँ हैं | लेकिन इन सबके बीच वह स्वयं कौन है? इस सवाल का जवाब बहुत कम लोग ढूँढ़ते हैं।
हम कहते हैं घर की लक्ष्मी है। लेकिन घर के बड़े फैसलों में उसकी ही आवाज़ सबसे धीमी होती है यह सम्मान है या सम्मान का अभिनय? लेकिन यह लेख केवल स्त्रियों के बारे में नहीं है क्योंकि जिस समाज ने स्त्री से कहा कि चुप रहो।
उसी समाज ने लड़कों से भी कहा गया हैं कि मत रो… मर्द बनो। यानी दोनों को जीने से पहले एक किरदार दे दिया गया। सोचिए…अगर किसी इंसान को बचपन से यही बताया जाए कि तुम्हें ऐसा ही होना है तो क्या वह कभी अपने वास्तविक स्वरूप को जान पाएगा ?
आध्यात्मिकता यहीं से शुरू होती है वह पूछती है तुम हो कौन? शरीर, नाम, रिश्ते या इन सबसे पहले एक जागरूक चेतना? जब तक हम सामने वाले को सिर्फ़ स्त्री या पुरुष के रूप में देखेंगे तब तक हम उसे पूरा इंसान नहीं देख पाएँगे और जिसे हम इंसान की तरह नहीं देखते उससे प्रेम भी नहीं कर सकते। हम केवल अपेक्षाएँ रखते हैं।
भगवद्गीता कहीं भी यह नहीं कहती कि सम्मान लिंग देखकर दो, वह तो समत्व की बात करती है। जहाँ अहंकार, श्रेष्ठता ,हीनता नहीं केवल सत्य हो।अगर दुनिया में कोई पूजा न हो, कोई उपाधि न हो, कोई “देवी” या “देवता” शब्द न हो तो क्या आप उस स्त्री का उतना ही सम्मान करेंगे? अगर जवाब “हाँ” है तो आपका सम्मान सच्चा है। अगर जवाब बदल जाता है तो शायद आप सम्मान नहीं एक परंपरा निभा रहे थे।
सबसे बड़ा सम्मान किसी को ऊँचा आसन देना नहीं है सबसे बड़ा सम्मान उसे उसकी स्वतंत्रता लौटाना है, उसे अपने निर्णय लेने देना है, अपनी आवाज़ रखने देना है और अपनी असहमति व्यक्त करने देना है।
निष्कर्ष –
स्त्री को देवी कहना आसान है। क्योंकि देवी सवाल नहीं पूछती, देवी कभी अपने सपनों की बात नहीं करती और देवी समाज से बहस नहीं करती। लेकिन एक इंसान करता है और शायद यही बात हमें असहज करती है। याद रखिए सम्मान का सबसे ऊँचा रूप पूजा नहीं है सम्मान का सबसे ऊँचा रूप है कि सामने वाले को पूरा इंसान मानना। और जब चेतना जागती है तब न स्त्री ऊँची रहती है न पुरुष। तब केवल मनुष्य बचता है और यही आध्यात्मिकता की शुरुआत है।
