सुबह आँख खुलते ही…क्या कभी तुमने देखा है कि सबसे पहले निर्णय कौन लेता है? तुम…या…तुम्हारा मन?
मन कहता है…कि आज मत उठो…और तुम रुक भी जाते हो और फिर मन कहता है…कि आज पढ़ाई का मन नहीं है..और तुम किताब बंद कर देते हो, मन कहता है…कि चलो, थोड़ा और मोबाइल चला लेते हैं…और देखते-देखते तुम्हारे कई घंटे बीत जाते है।
फिर शाम को तुम कहते हो…कि पता नहीं मेरे साथ ही ऐसा क्यों होता है? सवाल यह नहीं है कि तुम्हारे साथ ऐसा क्यों होता है। सवाल यह है कि…तुम्हारे जीवन का मालिक कौन है ? ज़रा सोचो…कि अगर एक कार का ड्राइवर ही सो जाए और स्टीयरिंग किसी बच्चे के हाथ में दे दे तो कार कहाँ जाएगी? जहाँ बच्चा चाहेगा, ठीक यही तुम्हारे साथ हो रहा है।
तुमने अपने जीवन की स्टीयरिंग ही अपने मन को दे दिया हैं और मन…कभी स्थिर नहीं होता। मन क्या चाहता है? आराम, सुविधा, तुरंत सुख, तुरंत परिणाम, बिना मेहनत सफलता, बिना त्याग प्रेम, बिना संघर्ष सम्मान। और जब उसे ये सब नहीं मिलता…वह दुखी हो जाता है, फिर तुम कहते हो…मैं दुखी हूँ।
क्या सच में? तुम दुःखी हो या…तुम्हारा मन दुखी है? सबसे बड़ा भ्रम यही है…हम मन की हर आवाज़ को अपनी आवाज़ मान लेते हैं।मन कहता है की तुम किसी काम के नहीं हो। और तुम मान भी लेते हो, मन कहता है कि वो तुम्हारे बिना खुश है और तुम टूट जाते हो।, मन कहता है कि सब लोग तुमसे आगे निकल गए। और तुम तुलना में जलने लगते हो।
एक बार भी तुम रुककर नहीं पूछते…क्या यह सच है? अगर कोई अजनबी सड़क पर आकर तुमसे कहे कि तुम निकम्मे हो। तो शायद तुम उसकी बात पर हँस दोगे। लेकिन…जब यही बात मन कहता है…तो तुम उसे सत्य मान लेते हो। क्यों? क्योंकि तुमने कभी मन को परखा ही नहीं।
मन एक अच्छा नौकर है…लेकिन बहुत ख़राब मालिक भी हैं जिस दिन मन मालिक बन गया…उस दिन जीवन आदतों से चलने लगता है और जिस दिन चेतना मालिक बन गई…उसी दिन जीवन पहली बार जागना शुरू करता है।
यही कारण है…कि हम जानते हुए भी वही गलतियाँ दोहराते हैं। हमें पता है कि क्रोध नुकसान करेगा,फिर भी क्रोध करते हैं, हमें पता है कि वासना हमें कमज़ोर बनाएगी,फिर भी उसके पीछे भागते हैं, हमें पता है कि मोबाइल समय बर्बाद कर रहा है, फिर भी स्क्रीन बंद नहीं कर पाते।
क्यों? क्योंकि…जानना और जागना, दोनों अलग बातें हैं। आज लोग कहते हैं कि मैं जैसा हूँ, वैसा ही हूँ।
नहीं…तुम जैसे हो…वैसे पैदा नहीं हुए थे। तुम्हें तुम्हारे मन ने धीरे-धीरे वैसा बना दिया। और सबसे दुख की बात यह हैं कि तुमने कभी विरोध भी नहीं किया।
अब ज़रा सोचिए अगर तुम्हारा मन कहे कि डरो…और तुम डर भी जाओ…तो निर्णय किसने लिया? अगर मन कहे कि नफ़रत करो…और तुम नफ़रत भी करने लगो…तो जी कौन रहा है? तुम…या…तुम्हारा मन?
जिस दिन तुम पहली बार अपने मन को बाहर से देख पाओगे, उसी दिन समझ जाओगे, कि मन तुम नहीं हो।मन सिर्फ़ विचारों का प्रवाह है। तुम वह हो…जो उन विचारों को देख सकता है और जो देख सकता है…वह उनसे बड़ा है।
यही आध्यात्मिकता की शुरुआत है।मन को दबाना नहीं…मन को देखना, विचारों से लड़ना नहीं…उन्हें समझना, भागना नहीं…जागना।
निष्कर्ष :-
जिस दिन तुमने मन की हर बात मानना बंद कर दिया उसी दिन तुम्हारा जीवन बदलना शुरू हो जाएगा क्योंकि…ग़ुलामी की सबसे ख़तरनाक ज़ंजीर लोहे की नहीं होती…वह उन विचारों की होती है, जिन्हें हम बिना जाँचे सच मान लेते हैं और याद रखो…मन को जीतना नहीं है…बस इतना जान लेना है कि तुम मन नहीं हो यहीं से तुम्हारे अंदर चेतना का जन्म होता है।
