क्या सचमुच हम इंसान हैं… या सिर्फ़ एक शरीर?
सुबह उठते ही सबसे पहले क्या याद आता है? आज क्या पहनना है, लोग मेरे बारे में क्या सोचेंगे, चेहरा कैसा लग रहा है, पैसे कितने कमाने हैं और रात तक पहुँचते-पहुँचते पूरा दिन इसी शरीर की इच्छाओं को पूरा करने में बीत जाता है।
फिर भी हम कहते हैं कि जीवन में शांति नहीं है। लेकिन सवाल यह है कि जिसने पूरा जीवन केवल शरीर को दिया, उसे शांति मिले भी तो कैसे?
शरीर बुरा नहीं है…लेकिन शरीर ही सब कुछ नहीं है।
भूख लगेगी, नींद आएगी,दर्द होगा…यह शरीर का स्वभाव है। समस्या तब शुरू होती है जब हम खुद को केवल शरीर मान लेते हैं। फिर हमारी हर पहचान शरीर से जुड़ जाती है। अगर कोई हमारी तारीफ़ करे…तो हम खुश हो जाते हैं। अगर कोई आलोचना कर दे तो रात भर सो नहीं पाते।
ज़रा सोचिए…जिस चीज़ की उम्र कुछ वर्षों की है…क्या उस पर अपनी पूरी पहचान टिका देना बुद्धिमानी है?
हम शरीर से बंधे नहीं हैं…हम शरीर से जुड़े भ्रम से बंधे हुए हैं अगर किसी बच्चे से बचपन से कहा जाए कि तुम सुंदर हो, इसलिए लोग तुम्हें पसंद करेंगे। या…तुम कमज़ोर हो, इसलिए तुम्हें हमेशा सहारे की ज़रूरत पड़ेगी। तो वह धीरे-धीरे इन बातों को सच मान लेता है।
यही हमारे साथ भी हुआ। समाज ने हमें अच्छे से सिखाया कि अच्छा दिखोगे तो ज़्यादा कमाओगे, दूसरों से आगे निकलो और हमने मान लिया कि यही जीवन है। किसी ने यह नहीं सिखाया कि पहले खुद को जानो।
सबसे बड़ा डर तुम्हें किस बात का है? तुम्हें डर हैं बुढ़ापे का, बीमारी का,मृत्यु का।
क्यों? क्योंकि जिसने खुद को शरीर मान लिया…उसे हर झुर्री अपनी हार लगती है। हर सफ़ेद बाल उसे समय की हार नहीं अपनी हार लगती है। यही कारण है कि आज पूरी दुनिया जवान दिखना चाहती है, लेकिन बहुत कम लोग जागना चाहते हैं।
शरीर का सुख कभी पूरा क्यों नहीं होता? क्योंकि शरीर की माँग का कोई अंत नहीं। आज नई चीज़ चाहिए, कल उससे बेहतर, फिर उससे भी बेहतर।इच्छाएँ पूरी नहीं होतीं…सिर्फ़ बदलती रहती हैं और हम इसे ही जीवन समझ बैठते हैं।
क्या आध्यात्मिकता शरीर छोड़ने का नाम है? बिल्कुल नहीं।
आध्यात्मिकता शरीर से भागना नहीं सिखाती…बल्कि यह समझना सिखाती है कि मैं केवल शरीर नहीं हूँ। क्योंकि शरीर एक साधन है…साध्य नहीं।जिस दिन यह बात समझ में आ जाती है…उसी दिन जीवन की दिशा बदलने लगती है।
एक छोटा-सा प्रश्न हैं कि अगर कल सुबह उठकर तुम्हारा चेहरा बदल जाए, तुम्हारा नाम बदल जाए, तुम्हारी नौकरी बदल जाए, तो क्या तुम भी बदल जाओगे?
अगर उत्तर हाँ है तो शायद आज तक तुमने खुद को जाना ही नहीं।
हमने जिम बनाए, ब्यूटी प्रोडक्ट्स बनाए, महँगे कपड़े खरीदे, सोशल मीडिया पर अपनी तस्वीरों को सुंदर बनाना सीख लिया लेकिन एक काम कभी नहीं किया खुद को देखने का।
कि शायद इसलिए…आईने में चेहरा रोज़ दिखाई देता है…लेकिन स्वयं कभी दिखाई नहीं देता।
निष्कर्ष- जब तक हम खुद को केवल शरीर मानते रहेंग तब तक हर चोट हमें तोड़ती रहेगी, हर असफलता हमारी पहचान बन जाएगी, हर प्रशंसा हमें नशा देगी और हर आलोचना हमें गिरा देगी लेकिन जिस दिन हमने समझ लिया कि मैं शरीर का उपयोग करता हूँ मैं शरीर नहीं हूँ। उसी दिन डर कम होने लगेगा, तुलना कम होने लगेगी और जीवन पहली बार बाहर नहीं भीतर से शुरू होगा।
क्योंकि शरीर से आगे बढ़ना, शरीर को छोड़ना नहीं… स्वयं को पहचानना है।