श्रीकृष्ण ने अर्जुन से युद्ध करने के लिए क्यों कहा?
अर्जुन युद्ध क्यों नहीं करना चाहता था? जब भी महाभारत की बात होती है एक सवाल अक्सर मन में आता है। अगर श्रीकृष्ण प्रेम, करुणा और शांति की बात करते थे तो फिर उन्होंने अर्जुन से युद्ध करने के लिए क्यों कहा? क्या युद्ध ही समाधान था? या उसके पीछे कोई और बात छिपी थी?युद्ध…
अर्जुन युद्ध क्यों नहीं करना चाहता था?
जब भी महाभारत की बात होती है एक सवाल अक्सर मन में आता है। अगर श्रीकृष्ण प्रेम, करुणा और शांति की बात करते थे तो फिर उन्होंने अर्जुन से युद्ध करने के लिए क्यों कहा?
क्या युद्ध ही समाधान था? या उसके पीछे कोई और बात छिपी थी?
युद्ध शुरू होने वाला था। अर्जुन ने अपने ही लोगों को सामने खड़ा देखा। अपने गुरु, रिश्तेदार और मित्रों को सामने देखकर उसके हाथ काँपने लगे। उसने अपना धनुष नीचे रख दिया।
श्रीकृष्ण ने अर्जुन से युद्ध करने के लिए क्यों कहा, यह समझने के लिए केवल युद्ध को नहीं बल्कि अर्जुन की मानसिक स्थिति, उसके मोह और उसके कर्तव्य को समझना जरूरी है।
क्या अर्जुन की करुणा वास्तव में मोह था?
वह बोला मैं यह युद्ध नहीं कर सकता। पहली नज़र में यह बात बहुत अच्छी लगती है।
लगता है अर्जुन दयालु हो गया लेकिन श्रीकृष्ण मुस्कुराए नहीं उन्होंने अर्जुन को रोका भी नहीं,
क्यों?
क्योंकि अर्जुन का निर्णय करुणा से नहीं मोह से पैदा हुआ था।
दोनों बातें देखने में एक जैसी लगती हैं।लेकिन दोनों में ज़मीन-आसमान का अंतर है।
श्रीकृष्ण ने अर्जुन को उसके कर्तव्य की याद क्यों दिलाई?
ज़रा सोचिए अगर कोई डॉक्टर अपने ही रिश्तेदार का ऑपरेशन करने से डर जाए तो क्या वह दयालु है?
बिल्कुल नहीं। वह अपने कर्तव्य से भाग रहा है।
यही बात श्रीकृष्ण अर्जुन को समझा रहे थे उन्होंने यह नहीं कहा जाओ और किसी से नफ़रत करो।
उन्होंने अर्जुन से किसी से नफ़रत करने के लिए नहीं कहा। उन्होंने उसे अपने धर्म और कर्तव्य को समझने की बात समझाई।
भगवद्गीता में धर्म और कर्तव्य का क्या अर्थ है?
यहाँ धर्म का मतलब जाति या पूजा-पाठ नहीं है।
यहाँ हम धर्म को केवल जाति या पूजा-पाठ के अर्थ में नहीं देख रहे हैं, बल्कि अपने कर्तव्य और सही आचरण के संदर्भ में समझ रहे हैं।
आज हम भी हर कठिन निर्णय से पहले एक अच्छा बहाना ढूँढ़ लेते हैं।
कभी कहते हैं दिल नहीं मान रहा।
कभी कहते हैं समय ठीक नहीं है।
कभी कहते हैं लोग क्या कहेंगे?
और फिर अपने डर को समझदारी का नाम दे देते हैं।
हम अपने जीवन के कुरुक्षेत्र से क्यों भागते हैं?
सच तो यह है हम सबके जीवन में एक कुरुक्षेत्र है।
किसी के लिए मोबाइल की लत, किसी के लिए वासना, किसी के लिए डर, किसी के लिए गलत रिश्ता, हर इंसान किसी न किसी युद्ध से भाग रहा है।
आध्यात्मिकता तुम्हें भागना नहीं सिखाती, वह सही कारण से लड़ना सिखाती है। दूसरों से नहीं सबसे पहले अपने भीतर बैठे झूठ से।
क्या हमारी सबसे बड़ी लड़ाई दूसरों से नहीं, खुद से है?
अगर अर्जुन युद्ध छोड़ देता तो शायद वह लोगों की नज़र में अच्छा इंसान बन जाता।
लेकिन वह अपने ही सत्य से हार जाता और जो अपने सत्य से हार जाए, उसे दुनिया की जीत भी शांति नहीं दे सकती।
आज भी हमारी सबसे बड़ी लड़ाई किसी और से नहीं है। हमारी लड़ाई अपने डर, अपने अहंकार, अपनी इच्छाओं और अपनी अज्ञानता से है।
जिस दिन तुमने इन पर विजय पा ली, उसी दिन तुम्हारा महाभारत समाप्त हो
श्रीकृष्ण की अर्जुन को दी गई सीख आज हमारे लिए क्या है?
श्रीकृष्ण ने अर्जुन से युद्ध इसलिए नहीं करवाया कि उन्हें हिंसा पसंद थी। उन्होंने युद्ध इसलिए करवाया क्योंकि सत्य से भागना, शांति नहीं होता।
कई बार सही जीवन जीने के लिए कठिन निर्णय लेने पड़ते हैं।
याद रखो श्रीकृष्ण ने अर्जुन के हाथ में हथियार नहीं दिया था, हथियार तो पहले से उसके हाथ में था। उन्होंने तो बस उसकी आँखों से मोह की धुंध हटा दी।
शायद आध्यात्मिकता भी यही करती है, वह तुम्हें नया इंसान नहीं बनाती वह सिर्फ़ तुम्हें तुम्हारा सत्य दिखा देती है।

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