प्रेम और अधिकार में क्या अंतर है?
कभी-कभी मुझे लगता है कि हम प्रेम कम करते हैं और मालिक ज़्यादा बनना चाहते हैं। हम कहते हैं, मैं तुम्हारी बहुत परवाह करता हूँ। लेकिन कुछ ही दिनों बाद वही परवाह बदलने लगती है। कहाँ जा रहे हो? किससे बात कर रहे थे? ऑनलाइन थे, जवाब क्यों नहीं दिया? मुझे बताए बिना बाहर मत…
कभी-कभी मुझे लगता है कि हम प्रेम कम करते हैं और मालिक ज़्यादा बनना चाहते हैं। हम कहते हैं, मैं तुम्हारी बहुत परवाह करता हूँ। लेकिन कुछ ही दिनों बाद वही परवाह बदलने लगती है। कहाँ जा रहे हो? किससे बात कर रहे थे? ऑनलाइन थे, जवाब क्यों नहीं दिया? मुझे बताए बिना बाहर मत जाना। और धीरे-धीरे रिश्ता प्रेम का नहीं, पूछताछ का बन जाता है।
सबसे अजीब बात जानते हो क्या है? हमें इसमें कुछ गलत भी नहीं लगता। क्योंकि हमने बचपन से यही देखा है। जिसे जितना ज़्यादा रोका गया, उसे उतना ही ज़्यादा प्रेम समझ लिया गया। किसी ने यह नहीं सिखाया कि प्रेम और अधिकार दो अलग-अलग बातें हैं।
प्रेम और अधिकार में क्या अंतर है?
ज़रा एक सवाल पूछो खुद से। अगर कोई इंसान तुम्हारे साथ इसलिए है क्योंकि उसे डर है कि तुम नाराज़ हो जाओगे, तो क्या वह सच में तुम्हारे साथ है? या तुम्हारे डर के साथ जी रहा है?
हम कहते हैं, मैं तुम्हें खोना नहीं चाहता। सुनने में यह प्रेम लगता है। लेकिन कई बार इसके पीछे प्रेम नहीं, असुरक्षा छिपी होती है। हमें सामने वाले के जाने का डर नहीं होता। हमें अपने अकेले रह जाने का डर होता है। और इसी डर को हम प्रेम का नाम दे देते हैं।
रिश्तों में अधिकार क्यों आने लगता है?
यही कारण है कि हम रिश्तों में आज़ादी से डरते हैं। हमें लगता है कि अगर उसे खुली उड़ान मिल गई तो वह हमें छोड़ देगा। लेकिन कभी सोचा है, अगर किसी को रोककर रखना पड़े तो वह पहले से ही तुम्हारा कहाँ था?
एक पक्षी को पिंजरे में बंद कर दो तो वह उड़ना बंद कर देगा। लेकिन क्या वह उड़ना भूल गया? नहीं। उसने सिर्फ़ उड़ने की जगह खो दी।
रिश्तों में भी हम अक्सर यही करते हैं। हम सामने वाले के पंख नहीं देखते, सिर्फ़ पिंजरा मज़बूत करते रहते हैं। और फिर कहते हैं, देखो, वह सिर्फ़ मेरा है।
क्या अधिकार प्रेम की निशानी है?
आजकल लोग कहते हैं, अगर मुझसे प्यार करते हो, तो सिर्फ़ मुझसे बात करो। मुझे हमेशा यह सुनकर एक सवाल आता है। अगर प्रेम इतना कमज़ोर है कि किसी तीसरे इंसान से दो बातें करने से टूट जाए, तो फिर वह प्रेम था या डर?
सच तो यह है कि अधिकार हमेशा भय से पैदा होता है और प्रेम विश्वास से।
जिसे खुद पर भरोसा नहीं होता, वह सामने वाले पर पहरा लगाता है। और जिसे प्रेम पर भरोसा होता है, वह सामने वाले को साँस लेने की जगह देता है।
क्या “मैं तुम्हारे बिना नहीं जी सकता” प्रेम है?
हम अक्सर कहते हैं, मैं तुम्हारे बिना नहीं जी सकता। लोग इसे सबसे रोमांटिक वाक्य मानते हैं। लेकिन ज़रा गौर करना। क्या यह प्रेम है? या अपनी अधूरी ज़िंदगी का बोझ किसी दूसरे के कंधों पर रख देना?
अगर हमारी पूरी खुशी, हमारी पहचान और हमारा अस्तित्व किसी एक इंसान पर निर्भर हो जाए, तो वहाँ प्रेम के साथ-साथ एक गहरी निर्भरता भी पैदा हो सकती है। और जहाँ निर्भरता बढ़ती है, वहाँ खोने का डर भी बढ़ने लगता है। फिर वही डर धीरे-धीरे अधिकार में बदल जाता है।
आध्यात्मिकता प्रेम और आसक्ति के बारे में क्या सिखाती है?
आध्यात्मिकता यहाँ एक बिल्कुल अलग बात कहती है। वह कहती है कि जब तक तुम अपने भीतर खाली हो, तब तक तुम हर रिश्ते से खुद को भरने की कोशिश करोगे। और जहाँ भरने की कोशिश होगी, वहाँ अधिकार अपने आप आ जाएगा। क्योंकि तुम्हें डर रहेगा कि अगर यह इंसान चला गया तो मैं फिर से खाली हो जाऊँगा।
लेकिन जिसने अपने भीतर स्वयं को जान लिया, उसे प्रेम की भीख नहीं माँगनी पड़ती। वह प्रेम करता है, लेकिन पकड़ता नहीं। वह साथ चलता है, लेकिन बाँधता नहीं। वह विश्वास करता है, लेकिन निगरानी नहीं करता।
प्रेम और आसक्ति में क्या अंतर है?
यही कारण है कि हमें भगवद्गीता की शिक्षाओं में आसक्ति के प्रति सावधान रहने की दृष्टि मिलती है। आसक्ति प्रेम जैसी दिखाई दे सकती है, लेकिन जब उसमें खोने का डर, निर्भरता और अधिकार बढ़ने लगे तो वही संबंध दुःख का कारण बन सकता है।
प्रेम स्वतंत्र करता है। आसक्ति बाँधती है। प्रेम तुम्हें बड़ा बनाता है और अधिकार तुम्हें छोटा कर देता है।
अगर आज तुम्हारा प्रिय व्यक्ति पूरी तरह स्वतंत्र हो और फिर भी हर दिन तुम्हारे पास लौटकर आना चुने, तो क्या वह प्रेम नहीं होगा? या तुम्हें फिर भी एक पिंजरे की ज़रूरत पड़ेगी?
शायद प्रेम का सबसे बड़ा प्रमाण किसी को रोक लेना नहीं है। बल्कि इतना विश्वास देना है कि वह पूरी तरह स्वतंत्र होकर भी तुम्हारे साथ रहना चुने।
प्रेम का सबसे बड़ा प्रमाण क्या है?
शायद प्रेम का अर्थ किसी इंसान पर अपना अधिकार जताना नहीं है। प्रेम का अर्थ है उसे समझना, उस पर विश्वास करना और उसकी स्वतंत्रता का सम्मान करना।
क्योंकि किसी को अपने पास रखना और किसी का अपनी इच्छा से आपके पास रहना, दोनों में बहुत बड़ा अंतर है।
जहाँ अधिकार शुरू होता है, वहाँ प्रेम धीरे-धीरे समाप्त होने लगता है। और जहाँ चेतना जागती है, वहीं प्रेम पहली बार जन्म लेता है।
