एक बात मैंने अपने आसपास बहुत देखी है रिश्ता जैसे-जैसे पुराना होता जाता है लोग प्रेम कम और पकड़ ज़्यादा मज़बूत करने लगते हैं। शुरुआत में कहते हैं कि तुम जैसे हो, वैसे ही अच्छे लगते हो और कुछ समय बाद ऐसे कपड़े मत पहनो, उससे बात मत करो, इतनी देर बाहर क्यों थे?, तुम बदल गए हो। और हमें लगता है कि रिश्ता गहरा हो रहा है।
सच यह हैं की जबकि रिश्ता धीरे-धीरे एक कैदखाना बन रहा है? हम अक्सर कहते हैं कि मैं तुम्हें खोना नहीं चाहता। लेकिन कभी खुद से पूछा तुम उसे खोने से डर रहे हो या उसके बिना खुद का सामना करने से? क्योंकि जो इंसान खुद के साथ सहज नहीं होता वह किसी और को छोड़ने की आज़ादी भी नहीं दे पाता।
ज़रा सोचिए अगर किसी पौधे को हर समय मुट्ठी में पकड़कर रखो तो क्या वह सुरक्षित रहेगा? नहीं वह पौधा तो मर जाएगा। पौधे को बढ़ने के लिए मिट्टी चाहिए, हवा चाहिए, धूप चाहिए और जगह चाहिए, रिश्ते भी ऐसे ही होते हैं।
आजकल लोग कहते हैं अगर सच में प्यार करते हो तो मुझे हर बात बताओ। मैं पूछना चाहता हूँ कि क्या प्रेम का मतलब हर पल की रिपोर्ट देना है? या इतना भरोसा होना कि हर बात पूछने की ज़रूरत ही न पड़े?
हमने प्रेम को विश्वास से नहीं बल्कि डर से जोड़ दिया है। इसलिए जब सामने वाला देर से Reply करता है तो प्रेम नहीं टूटता हमारी असुरक्षा सामने आ जाती है। जब वह किसी और से हँसकर बात करता है तो रिश्ता नहीं बदलता हमारा डर बोलने लगता है। यही वजह है कि कई लोग रिश्ते में होते हुए भी हर समय थके हुए रहते हैं। क्योंकि जहाँ हर समय खुद को साबित करना पड़े वहाँ प्रेम नहीं परीक्षा चल रही होती है।
अगर कोई इंसान सिर्फ़ इसलिए तुम्हारे साथ है क्योंकि उसे तुम्हें छोड़ने में डर लगता है तो क्या वह रिश्ता है? या दो लोगों का साझा भय? आध्यात्मिकता यहाँ एक गहरी बात कहती है कि जिसे स्वयं का सहारा मिल गया उसे किसी को पकड़कर रखने की ज़रूरत नहीं पड़ती। क्योंकि वह जानता है प्रेम कभी पकड़ने से नहीं मिलता। प्रेम तो तब दिखाई देता है. जब सामने वाले के पास जाने की पूरी आज़ादी हो और फिर भी वह रुकना चुने।
भगवद्गीता में श्रीकृष्ण ने अर्जुन को अपने पास बाँधकर नहीं रखा। उन्होंने अर्जुन को समझाया, जगाया…और अंत में कहा अब जो उचित लगे, वह करो। सोचिए…अगर स्वयं श्रीकृष्ण निर्णय थोपते नही हैं तो हम अपने रिश्तों में दूसरों की स्वतंत्रता क्यों छीन लेते हैं?
प्रेम का अर्थ किसी को अपने जैसा बना देना नहीं है। प्रेम का अर्थ उसे उसके सत्य तक पहुँचने में सहयोग देना है। आज लोग कहते हैं मैं तुम्हारे बिना अधूरा हूँ। लेकिन दो अधूरे लोग एक-दूसरे को पूरा नहीं कर सकते। वे सिर्फ़ एक-दूसरे पर निर्भर हो जाते हैं और निर्भरता धीरे-धीरे अधिकार में बदल जाती है।
एक स्वस्थ रिश्ता दो लोगों का सहारा नहीं दो स्वतंत्र व्यक्तियों का मिलन होता है। जहाँ दोनों के पास अपनी सोच हो, अपनी पहचान हो, अपना विकास हो और फिर भी वे साथ चलना चुनें।
निष्कर्ष –
जिस रिश्ते को हर दिन पकड़कर रखना पड़े उसे बचाया नहीं जा रहा उसे खींचा जा रहा है। प्रेम कभी ज़ंजीर नहीं बनता वह तो एक खुला आकाश है जहाँ दोनों उड़ सकते हैं और फिर भी एक-दूसरे को चुनते हैं। याद रखिए जिस प्रेम को निगरानी चाहिए वह प्रेम नहीं, असुरक्षा है।और जिस प्रेम में स्वतंत्रता है वहीं चेतना है और जहाँ चेतना है वहीं सच्चा प्रेम जन्म लेता है।
