क्या नारीवाद पुरुषों के खिलाफ़ है?
जब भी नारीवाद शब्द सुनाई देता है, कई लोगों के चेहरे बदल जाते हैं। कुछ लोग कहते हैं ये तो सिर्फ़ पुरुषों के खिलाफ़ एक आंदोलन है। कुछ कहते हैं आजकल लड़कियाँ नारीवाद के नाम पर कुछ भी करती हैं और कुछ बिना समझे ही या तो इसका समर्थन करने लगते हैं या विरोध। लेकिन…
जब भी नारीवाद शब्द सुनाई देता है, कई लोगों के चेहरे बदल जाते हैं। कुछ लोग कहते हैं ये तो सिर्फ़ पुरुषों के खिलाफ़ एक आंदोलन है। कुछ कहते हैं आजकल लड़कियाँ नारीवाद के नाम पर कुछ भी करती हैं और कुछ बिना समझे ही या तो इसका समर्थन करने लगते हैं या विरोध। लेकिन क्या हमने कभी रुककर यह समझने की कोशिश की है कि नारीवाद आखिर है क्या?
नारीवाद क्या है?
सच कहूँ, मुझे नारीवाद से ज़्यादा हमारे देखने के तरीके से समस्या है। हम हर विचार को दो हिस्सों में बाँट देते हैं। या तो हमारे पक्ष में या हमारे खिलाफ़। बीच में समझने की जगह ही नहीं बचती।
अगर कोई स्त्री कहे, मुझे भी अपने जीवन के निर्णय लेने का अधिकार है। तो इसमें पुरुषों के खिलाफ़ क्या है? अगर कोई कहे, मुझे इंसान की तरह देखा जाए, तो इसमें विरोध कहाँ है? हमने सदियों तक स्त्री को देवी कहा, लेकिन जब उसने इंसान की तरह जीने की बात की तो हमें समस्या होने लगी। शायद देवी बनाना आसान था, इंसान मानना कठिन है।
क्या महिलाओं की स्वतंत्रता पुरुषों के खिलाफ़ है?
लेकिन एक और सच भी है कि अगर नारीवाद सिर्फ़ पुरुषों से नफ़रत करना बन जाए तो वह भी उतना ही गलत है। क्योंकि घृणा कभी स्वतंत्रता नहीं दे सकती, वह सिर्फ़ नई दीवारें खड़ी करती है।
असल सवाल यह नहीं है कि पुरुष सही है या स्त्री। असल सवाल यह है, क्या दोनों स्वतंत्र हैं? क्योंकि जहाँ किसी को भी सिर्फ़ उसके लिंग के आधार पर ऊँचा या नीचा समझा जाए, वहाँ अन्याय ही है।
पुरुषों और महिलाओं पर सामाजिक दबाव
ज़रा अपने घरों को देखिए। लड़कों से कहा जाता है, मत रो… मर्द बनो। और लड़कियों से कहा जाता है, ज़्यादा मत बोलो… लोग क्या कहेंगे?
सोचिए, कैद सिर्फ़ लड़कियों की नहीं है, कैद असल में सोच की भी है। एक को रोने की आज़ादी नहीं, दूसरे को जीने की। यही कारण है कि मैं नारीवाद को पुरुष बनाम स्त्री की लड़ाई नहीं मानता। यह मनुष्य की स्वतंत्रता की बात है। और जहाँ स्वतंत्रता की बात होगी, वहाँ आध्यात्मिकता भी होगी।
नारीवाद और आध्यात्मिकता
आध्यात्मिकता कहती है पहचान शरीर से नहीं होती। न पुरुष होना तुम्हारी अंतिम पहचान है, न ही स्त्री होना। सबसे पहले तुम एक चेतन मनुष्य हो। जब तक हम सिर्फ़ शरीर के आधार पर एक-दूसरे को देखेंगे, तब तक संघर्ष चलता रहेगा।
भगवद्गीता और धर्म की दृष्टि
भगवद्गीता में श्रीकृष्ण अर्जुन को कहीं यह नहीं कहते कि पहले यह देखो सामने स्त्री है या पुरुष। वह कहते हैं धर्म के अनुसार चलो। धर्म यानी जो सत्य हो, जो न्यायपूर्ण हो, जो किसी के भय या अहंकार से पैदा न हुआ हो।
अगर कल दुनिया में पुरुष और स्त्री जैसे शब्द ही न रहें, तो क्या फिर भी सम्मान की ज़रूरत खत्म हो जाएगी? बिल्कुल नहीं। क्योंकि सम्मान लिंग का नहीं, चेतना का विषय है।
निष्कर्ष
नारीवाद पुरुषों के खिलाफ़ युद्ध नहीं है और पुरुष होना किसी अपराध का नाम भी नहीं। समस्या न पुरुष है, न ही स्त्री। समस्या वह सोच है जो इंसान को इंसान की तरह देखना भूल गई।
याद रखिए, जहाँ श्रेष्ठता का अहंकार है वहाँ प्रेम नहीं टिक सकता। और जहाँ समानता भी केवल कानून में हो, लेकिन चेतना में न हो, वहाँ न्याय अधूरा रह जाता है। क्योंकि आध्यात्मिकता हमें स्त्री या पुरुष बनना नहीं सिखाती, वह हमें मनुष्य बनना सिखाती है।
