तुम कहते हो कि मुझे डर लगता है लेकिन कभी रुककर यह पूछा है…असल में डरता कौन है?
क्या सच में तुम डरते हो… या तुम्हारे मन ने तुम्हारे बारे में जो कहानी बना रखी है, वह डरती है?
हममें से ज़्यादातर लोग किसी घटना से नहीं डरते। हम उस कहानी से डरते हैं, जो हमने उस घटना के बारे में पहले ही लिख दी होती है। यही कारण है कि काम शुरू होने से पहले ही मन हार मान लेता है। तुम भविष्य नहीं देखते…तुम अपनी कल्पना देखते हो, मान लो तुम्हें स्टेज पर बोलना है अभी तुम स्टेज पर पहुँचे भी नहीं हो। लेकिन तुम्हारा मन क्या कह रहा है?
“अगर मैं अटक गया तो?”, “अगर लोग हँसने लगे तो?” , “अगर सबने मुझे जज किया तो?”
ज़रा ध्यान से देखो… इनमें से एक भी घटना अभी हुई नहीं है। लेकिन तुम्हारा मन पहले ही उन्हें सच मान चुका है। और फिर तुम कहते हो…कि मुझे स्टेज से डर लगता है
नहीं। तुम्हें स्टेज से नहीं…अपनी कल्पना से डर लगता है।
क्या सच में हार से डर लगता है? एक धावक (Runner) दौड़ रहा है। उससे पूछो की डर किस बात का है ? वह यही कहेगा कि मुझे डर सिर्फ रेस हारने का हैं। लकिन अगर रेस हारने के बाद भी उसका सम्मान बना रहे…परिवार उसे स्वीकार करे…और जीवन सामान्य चलता रहे…तो क्या वह उतना ही डरेगा?
शायद नहीं। तो फिर डर रेस का नहीं था। डर उस नुकसान का था, जिसे उसने अपने भविष्य से जोड़ रखा था।
कभी पैसे का नुकसान…, कभी पहचान का…कभी सम्मान का…कभी दूसरों की नज़रों में छोटा हो जाने का हमें डर होता हैं।
जहाँ मोह है…वहीं डर पैदा होता है। जिस चीज़ को तुमने अपनी पहचान बना लिया…उसे खोने का डर भी उतना ही बड़ा होगा। अगर तुम्हारी पहचान नौकरी है…तो नौकरी जाने का डर रहेगा। अगर पहचान रिश्ता है…तो उसे खोने का डर रहेगा। अगर पहचान पैसा है…तो गरीबी का डर रहेगा।अगर पहचान लोगों की तारीफ़ है…तो आलोचना ज़हर लगेगी।
डर बाहर नहीं पैदा होता। डर वहीं पैदा होता है…जहाँ तुमने अपने सुख को बाँध रखा होता है।
बचपन से हमें क्या सिखाया गया? हमें सिखाया गया कि अच्छे नंबर लाओ…वरना पीछे रह जाओगे।, अच्छी नौकरी पाओ…वरना लोग क्या कहेंगे।बहुत पैसा कमाओ…तभी सफल कहलाओगे।
धीरे-धीरे हमने मान लिया कि हमारी कीमत…हमारे भीतर नहीं, हमारी उपलब्धियों में है। और यहीं से डर शुरू हो गया। क्योंकि जो चीज़ उपलब्धियों पर टिकी हो…वह हर समय टूटने के डर में जीती है।
याद रखिये तुम कमजोर नहीं हो…तुम बस अपनी बनाई हुई कहानी पर विश्वास कर बैठे हो।
मन कहता है कि अगर मैं असफल हुआ, तो मैं खत्म हो जाऊँगा। लेकिन सच पूछो…क्या एक असफलता किसी इंसान की पूरी पहचान तय कर देती है? या यह सिर्फ़ मन का बनाया हुआ निष्कर्ष है?
डर से लड़ना समाधान नहीं है। आजकल लोग कहते हैं कि “Fear ko conquer karo.” लेकिन मैं पूछता हूँ… जिस डर का कारण ही नहीं समझा, उसे जीतोगे कैसे? डर को दबाने से…वह खत्म नहीं होता। वह बस रूप बदल लेता है। कभी गुस्सा बन जाता है।, कभी चिंता, कभी Overthinking, कभी रातों की बेचैनी बन जाता हैं।
अगली बार जब डर लगे…तो खुद से सिर्फ़ एक सवाल पूछना कि मैं किस चीज़ को खोने से डर रहा हूँ? पैसा,रिश्ता, सम्मान, या…अपने बारे में बनाई हुई उस छवि को, जिसे बचाने में मैं पूरी ज़िंदगी लगा चुका हूँ? शायद…यहीं से उत्तर मिलना शुरू होगा।
अंतिम प्रश्न यह हैं कि अगर तुम्हारे पास खोने के लिए कुछ भी न हो…तो क्या डर फिर भी रहेगा? हो सकता है…डर कभी तुम्हारी कमजोरी था ही नहीं।वह केवल तुम्हारे मोह का आईना था। और जिस दिन तुम अपने मोह को पहचान लोगे…उसी दिन डर से आज़ाद होने की यात्रा भी शुरू हो जाएगी।
सोच से समझ तक, समझ से परिवर्तन तक